केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने देश में स्नातकोत्तर और स्नातक चिकित्सा शिक्षा क्षमता में व्यापक विस्तार को मंजूरी दी
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राज्य सरकार/केंद्र सरकार के मौजूदा मेडिकल कॉलेजों/स्वतंत्र स्नातकोत्तर संस्थानों/सरकारी अस्पतालों के सुदृढ़ीकरण और उन्नयन हेतु, केंद्र प्रायोजित योजना के तीसरे चरण को स्वीकृति दे दी है, ताकि 5,000 स्नातकोत्तर सीटें बढ़ाई जा सकें। साथ ही, 1.50 करोड़ रुपये प्रति सीट लागत सीमा से सरकारी मेडिकल कॉलेजों को उन्नत बनाने हेतु केंद्र प्रायोजित योजना का विस्तार कर 5,023 एमबीबीएस सीटें बढ़ाई जाएंगी। इस कदम से स्नातक चिकित्सा क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी; अतिरिक्त स्नातकोत्तर सीटें सृजित होने से विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ेगी; और सरकारी संस्थानों में नए क्षेत्र में चिकित्सा विशेषज्ञता सेवा आरंभ करने में मदद मिलेगी। इससे देश में डॉक्टरों की समग्र उपलब्धता बढ़ेगी।
दोनों योजनाओं पर वर्ष 2025-26 से 2028-29 की अवधि में कुल वित्तीय परिव्यय 15,034.50 करोड़ रुपये आएगा। 15034.50 करोड़ रुपये में केंद्र सरकार की देनदारी 10,303.20 करोड़ रुपये और राज्य की देनदारी का हिस्सा 4731.30 करोड़ रुपये होगी।
लाभ
राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के सरकारी मेडिकल कॉलेजों/संस्थानों में मेडिकल सीट बढ़ाने की योजना से देश में डॉक्टरों और विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता बढ़ेगी, जिससे लोगों को खासकर वंचित क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा मिलेगी। इससे सरकारी संस्थानों में मौजूदा बुनियादी ढांचे के तहत तृतीयक स्वास्थ्य सेवा का लागत-प्रभावी विस्तार भी होगा क्योंकि स्नातकोत्तर सीटों में बढ़ोतरी से महत्वपूर्ण चिकित्सा संवर्गों में विशेषज्ञों की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित होगी। इन योजनाओं का उद्देश्य मौजूदा बुनियादी ढांचे में लागत-प्रभावी रहते हुए स्वास्थ्य सेवा संसाधनों के संतुलित क्षेत्रीय वितरण को बढ़ाना है। दीर्घावधि में, ये योजनाएं वर्तमान और उभरती स्वास्थ्य आवश्यकताएं पूरी करने के लिए देश की समग्र स्वास्थ्य प्रणाली को सुदृढ़ बनाएगी।
रोजगार सृजन सहित प्रभाव:
योजनाओं के अपेक्षित प्रमुख प्रभाव/परिणाम निम्नलिखित हैं:
- भारत में चिकित्सा शिक्षा प्राप्त करने के लिए छात्रों को अधिक अवसर प्रदान करना।
- वैश्विक मानकों के अनुरूप चिकित्सा शिक्षा और प्रशिक्षण गुणवत्ता बढ़ाना।
- डॉक्टरों और विशेषज्ञों की पर्याप्त उपलब्धता भारत को सस्ती दर पर स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने के प्रमुख स्थान के रूप में स्थापित कर सकती है, जिससे विदेशी मुद्रा अर्जन भी बढ़ेगा।
- स्वास्थ्य सेवा पहुंच में विशेष रूप से वंचित ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में अंतर पाटा जा सकेगा।
- डॉक्टरों, संकाय, पैरामेडिकल स्टाफ, शोधकर्ताओं, प्रशासकों और सहायक सेवाओं से संबंधित प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर उत्पन्न होंगे।
- स्वास्थ्य प्रणाली में स्थिति अनुरूपता बढ़ेगी और समग्र सामाजिक-आर्थिक विकास में इसका योगदान मिलेगा।
- राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों में स्वास्थ्य सेवा बुनियादी ढांचे के समान वितरण को बढ़ावा मिलेगा।
कार्यान्वयन रणनीति और लक्ष्य:
इन योजनाओं का लक्ष्य 2028-2029 तक सरकारी संस्थानों में 5000 स्नातकोत्तर सीटें और 5023 मेडिकल स्नातक सीटें बढ़ाना है। योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय विस्तृत दिशानिर्देश जारी करेगा।
पृष्ठभूमि:
1.4 अरब लोगों के लिए सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (यूएचसी) को साकार करना एक सुदृढ़ स्वास्थ्य सेवा प्रणाली पर निर्भर करता है जो सभी स्तरों और समय पर, उच्च-मानक सेवा प्रदान करने में सक्षम हो—खासकर यह ग्रामीण, आदिवासी और दुर्गम समुदायों में स्वास्थ्य सेवा प्रदान कर सके। सुदृढ़ स्वास्थ्य सेवा प्रणाली कुशल और पर्याप्त कार्यबल उपलब्धता पर निर्भर करती है।
हाल के वर्षों में भारत की स्वास्थ्य सेवा शिक्षा और कार्यबल अवसंरचना में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो स्वास्थ्य सेवा की पहुंच व्यापक बनाने और गुणवत्ता में सुधार पर निरंतर नीतिगत ध्यान केंद्रित करने के प्रयास को दर्शाती है। भारत में अभी 808 मेडिकल कॉलेज हैं, जो विश्व में सर्वाधिक है। इनमें कुल एक लाख 23 हजार 700 एमबीबीएस सीटें हैं। पिछले एक दशक में, 127 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 69 हजार 352 से अधिक नई एमबीबीएस सीटें जोड़ी गई हैं। इसी अवधि में 143 प्रतिशत की वृद्धि से अतिरिक्त 43 हजार 041 स्नातकोत्तर मेडिकल सीटें जोड़ी गईं हैं। मेडिकल सीटों की संख्या में इस व्यापक वृद्धि के बावजूद स्वास्थ्य सेवा की मांग, पहुंच और सामर्थ्य क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता है।
इसके अलावा, प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के तहत स्वीकृत 22 नए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान-एम्स तृतीयक स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने के अलावा, अत्याधुनिक शिक्षण सुविधाओं के साथ चिकित्सा क्षमता के उच्चतम मानकों के स्वास्थ्य पेशेवर तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
योग्य संकाय सदस्यों की संख्या बढ़ाने के लिए, संकाय पात्रता और भर्ती हेतु समावेशी और योग्यता-आधारित दृष्टिकोण अपनाते हुए नए चिकित्सा संस्थान (संकाय योग्यता) विनियम 2025 जारी किए गए हैं। इनका उद्देश्य चिकित्सा शिक्षकों की बढ़ती आवश्यकता पूरी करना और उच्चतम शैक्षणिक एवं व्यावसायिक मानक बनाए रखना है।
स्वास्थ्य क्षेत्र में योग्य मानव संसाधन की उपलब्धता बढ़ाने के लिए, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय इन योजनाओं को संचालित कर रहा है। इनमें विस्तार किया जाना अधिक चिकित्सा पेशेवरों को तैयार करने के क्षमता सृजन, स्वास्थ्य क्षेत्र में मानव संसाधन सुदृढ़ करने और देश के लोगों को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने और उनकी पहुंच व्यापक बनाने की सरकार की प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है।
कैबिनेट ने 2277.397 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ डीएसआईआर योजना “क्षमता निर्माण और मानव संसाधन विकास” को मंजूरी दी
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल ने पंद्रहवें वित्त आयोग 2021-22 से 2025-26 की अवधि के लिए 2277.397 करोड़ रुपये के कुल परिव्यय के साथ “क्षमता निर्माण और मानव संसाधन विकास” पर वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान विभाग/वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (डीएसआईआर/सीएसआईआर) योजना को मंजूरी दे दी है।
इस योजना में सीएसआईआर द्वारा कार्यान्वित की जा रही है और देश भर के सभी अनुसंधान एवं विकास संस्थान, राष्ट्रीय प्रयोगशालाएं, राष्ट्रीय महत्व के संस्थान, प्रतिष्ठित संस्थान और विश्वविद्यालय शामिल किए जाएंगे। यह पहल विश्वविद्यालयों, उद्योग, राष्ट्रीय अनुसंधान एवं विकास प्रयोगशालाओं और शैक्षणिक संस्थानों में करियर बनाने के इच्छुक युवा, उत्साही शोधकर्ताओं के लिए एक व्यापक मंच प्रदान करती है। प्रख्यात वैज्ञानिकों और प्रोफेसरों के मार्गदर्शन में, यह योजना विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं इंजीनियरिंग, चिकित्सा और गणितीय विज्ञान (एसटीईएमएम) के विकास को बढ़ावा देगी।
क्षमता निर्माण एवं मानव संसाधन विकास योजना, प्रति दस लाख जनसंख्या पर शोधकर्ताओं की संख्या बढ़ाकर, भारत में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी क्षेत्र के स्थायी विकास लक्ष्यों (एसडीजी) की प्राप्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस योजना ने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी क्षेत्र में क्षमता निर्माण और उच्च-गुणवत्ता वाले मानव संसाधनों के भंडार का विस्तार करके अपनी प्रासंगिकता सिद्ध की है।
पिछले दशक के दौरान भारत सरकार द्वारा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (एस एंड टी) में अनुसंधान एवं विकास (आर एंड डी) के लिए किए गए समन्वित प्रयासों से, विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (डब्ल्यूआईपीओ) की रैंकिंग के अनुसार, भारत ने 2024 में वैश्विक नवाचार सूचकांक (जीआईआई) में अपनी स्थिति सुधारकर 39वीं रैंक प्राप्त कर ली है, जो भारत के प्रधानमंत्री के दूरदर्शी मार्गदर्शन में निकट भविष्य में और भी बेहतर होगी। सरकार द्वारा अनुसंधान एवं विकास को दिए गए सहयोग के परिणामस्वरूप, एनएसएफ, यूएसए के आंकड़ों के अनुसार, भारत अब वैज्ञानिक शोधपत्र प्रकाशनों के मामले में शीर्ष तीन में शामिल है। डीएसआईआर की योजना हजारों शोधार्थियों और वैज्ञानिकों को सहायता प्रदान कर रही है, जिनके परिणामों ने भारत की विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी उपलब्धियों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
इस अनुमोदन ने सीएसआईआर की अम्ब्रेला योजना कार्यान्वयन के माध्यम से सीएसआईआर की भारतीय वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान को दी गई 84 वर्षों की सेवा के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि प्रदान की है जो वर्तमान और भावी पीढ़ियों में देश की अनुसंधान एवं विकास प्रगति को गति प्रदान करती है। सीएसआईआर की अम्ब्रेला योजना “क्षमता निर्माण और मानव संसाधन विकास (सीबीएचआरडी)” की चार उप-योजनाएँ हैं, जैसे (i) डॉक्टरेट और पोस्टडॉक्टरल फेलोशिप (ii) एक्स्ट्राम्यूरल रिसर्च स्कीम, एमेरेटस साइंटिस्ट स्कीम और भटनागर फेलोशिप कार्यक्रम; (iii) पुरस्कार योजना के माध्यम से उत्कृष्टता को बढ़ावा देना और मान्यता प्रदान करना; और (iv) यात्रा और संगोष्ठी अनुदान योजना के माध्यम से ज्ञान साझाकरण को बढ़ावा देना।
यह पहल एक मजबूत अनुसंधान एवं विकास संचालित नवाचार इकोसिस्टम के निर्माण और 21वीं सदी में वैश्विक नेतृत्व के लिए भारतीय विज्ञान को तैयार करने की दिशा में सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने रेलवे कर्मचारियों को 78 दिनों के उत्पादकता से जुड़े बोनस को स्वीकृति दी
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आज 10 लाख 91 हजार 146 रेलवे कर्मचारियों को 78 दिनों के उत्पादकता से जुड़े बोनस (पीएलबी) के रूप में 1865 करोड़ 68 लाख रुपये के भुगतान को स्वीकृति दी। रेलवे कर्मचारियों के बेहतर कामकाज को मान्यता देते हुए यह मंजूरी दी गई है।
प्रत्येक वर्ष दुर्गा पूजा/दशहरा की छुट्टियों से पहले पात्र रेल कर्मचारियों को उत्पादकता से जुड़े बोनस का भुगतान किया जाता है। इस वर्ष भी, लगभग 10 लाख 91 हजार अराजपत्रित रेल कर्मचारियों को 78 दिनों के वेतन के बराबर पीएलबी राशि का भुगतान किया जा रहा है। रेलवे के समग्र प्रदर्शन में सुधार हेतु रेल कर्मचारियों को प्रेरित करने के लिए प्रोत्साहन के रूप में पीएलबी भुगतान किया जाता है।
प्रत्येक पात्र रेल कर्मचारी के लिए 78 दिनों के वेतन के बराबर अधिकतम देय पीएलबी राशि 17 हजार 951 रुपये है। यह राशि विभिन्न श्रेणियों के रेल कर्मचारियों जैसे ट्रैक मेंटेनर, लोको पायलट, ट्रेन मैनेजर (गार्ड), स्टेशन मास्टर, सुपरवाइजर, तकनीशियन, तकनीशियन हेल्पर, पॉइंट्समैन, मंत्रालयिक कर्मचारी और अन्य ग्रुप-सी कर्मचारियों को दी जाएगी।
वर्ष 2024-25 में रेलवे का प्रदर्शन काफी अच्छा रहा। रेलवे ने रिकॉर्ड 1614.90 मिलियन टन माल ढुलाई की और लगभग 7.3 बिलियन यात्रियों को गंतव्य स्थल तक पहुंचाया।
जहाज निर्माण, समुद्री क्षेत्र में वित्तपोषण और घरेलू क्षमता को मजबूत करने के लिए व्यापक चहुंमुखी पहल
मंत्रिमंडल ने भारत के जहाज निर्माण और समुद्री क्षेत्र को पुनर्जीवित करने के लिए 69,725 करोड़ रुपये के पैकेज को मंजूरी दी
जहाज निर्माण वित्तीय सहायता योजना को कुल 24,736 करोड़ रुपये की राशि के साथ 31 मार्च 2036 तक बढ़ाया गया
20,000 करोड़ रुपये के समुद्री क्षेत्र निवेश कोष के साथ समुद्री विकास निधि को मंजूरी दी गई
19,989 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ जहाज निर्माण विकास योजना का लक्ष्य घरेलू जहाज निर्माण क्षमता को 4.5 मिलियन सकल टन भार तक विस्तारित करना है
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में समुद्री क्षेत्र के सामरिक और आर्थिक महत्व को स्वीकार करते हुए, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आज भारत के जहाज निर्माण और समुद्री इको-सिस्टम को पुनर्जीवित करने के लिए 69,725 करोड़ रुपये के एक व्यापक पैकेज को मंज़ूरी दी। यह पैकेज घरेलू क्षमता को मजबूत करने, दीर्घकालिक वित्तपोषण में सुधार करने, ग्रीनफील्ड और ब्राउनफील्ड शिपयार्ड विकास को बढ़ावा देने, तकनीकी क्षमताओं और कौशल को बढ़ाने के साथ-साथ एक मज़बूत समुद्री इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने हेतु कानूनी, कराधान और नीतिगत सुधारों को लागू करने के लिए डिजाइन किए गए चहुंमुखी पहल को प्रस्तुत करता है।
इस पैकेज के तहत, जहाज निर्माण वित्तीय सहायता योजना (एसबीएफएएस) को 31 मार्च 2036 तक बढ़ाया जाएगा और इसकी कुल राशि 24,736 करोड़ रुपये होगी। इस योजना का उद्देश्य भारत में जहाज निर्माण को प्रोत्साहित करना है और इसमें 4,001 करोड़ रुपये के आवंटन के साथ एक शिपब्रेकिंग क्रेडिट नोट भी शामिल है। सभी पहलों के कार्यान्वयन की निगरानी के लिए एक राष्ट्रीय जहाज निर्माण मिशन भी स्थापित किया जाएगा।
इसके अलावा, इस क्षेत्र के लिए दीर्घकालिक वित्तपोषण प्रदान करने हेतु 25,000 करोड़ रुपये की राशि के साथ समुद्री विकास निधि (एमडीएफ) को मंजूरी दी गई है। इसमें भारत सरकार की 49 प्रतिशत भागीदारी वाला 20,000 करोड़ रुपये का समुद्री निवेश कोष और ऋण की प्रभावी लागत कम करने तथा परियोजना की बैंकिंग क्षमता में सुधार हेतु 5,000 करोड़ रुपये का ब्याज प्रोत्साहन कोष शामिल है। इसके अलावा, 19,989 करोड़ रुपये के बजटीय परिव्यय वाली जहाज निर्माण विकास योजना (एसबीडीएस) का उद्देश्य घरेलू जहाज निर्माण क्षमता को सालाना 4.5 मिलियन सकल टन भार तक बढ़ाना, मेगा जहाज निर्माण समूहों को सहायता प्रदान करना, इन्फ्रास्ट्रक्चर का विस्तार करना, भारतीय समुद्री विश्वविद्यालय के अंतर्गत भारत जहाज प्रौद्योगिकी केंद्र की स्थापना करना और जहाज निर्माण परियोजनाओं के लिए बीमा सहायता सहित जोखिम कवरेज प्रदान करना है।
इस समग्र पैकेज से 4.5 मिलियन सकल टन भार की जहाज निर्माण क्षमता का विकास होने, लगभग 30 लाख रोजगार सृजित होने और भारत के समुद्री क्षेत्र में लगभग 4.5 लाख करोड़ रुपये का निवेश आकर्षित होने की उम्मीद है। अपने आर्थिक प्रभाव के अलावा, यह पहल महत्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखलाओं और समुद्री मार्गों में अनुकूलन लाकर राष्ट्रीय, ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा को भी मजबूत करेगी। यह भारत की भू-राजनीतिक दृढ़ता और रणनीतिक आत्मनिर्भरता को भी सुदृढ़ करेगा, आत्मनिर्भर भारत के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाएगा और भारत को वैश्विक नौवहन एवं जहाज निर्माण के क्षेत्र में एक प्रतिस्पर्धी शक्ति के रूप में स्थापित करेगा।
भारत का एक लंबा और गौरवशाली समुद्री इतिहास रहा है, जिसमें सदियों पुराना व्यापार और समुद्री यात्रा इस उपमहाद्वीप को दुनिया से जोड़ती रही है। आज, समुद्री क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ बना हुआ है, जो देश के लगभग 95 प्रतिशत व्यापार को मात्रा के हिसाब से और 70 प्रतिशत मूल्य के हिसाब से सहारा देता है। इसके मूल में जहाज निर्माण है, जिसे अक्सर “भारी इंजीनियरिंग की जननी” कहा जाता है, जो न केवल रोज़गार और निवेश में महत्वपूर्ण योगदान देता है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, रणनीतिक स्वतंत्रता और व्यापार एवं ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखलाओं के अनुकूलन को भी बढ़ाता है।
कैबिनेट ने बिहार में 3,822.31 करोड़ रुपए की लागत से एनएच-139डब्ल्यू के साहेबगंज-अरेराज-बेतिया खंड को 4-लेन का बनाने के प्रस्ताव को हाइब्रिड एन्युइटी मोड (एचएएम) पर मंजूरी दी
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडल समिति ने आज बिहार में एनएच-139डब्ल्यू के साहेबगंज-अरेराज-बेतिया खंड को 4-लेन का बनाने के प्रस्ताव को हाइब्रिड एन्युइटी मोड (एचएएम) पर मंजूरी दी। इस परियोजना की कुल लंबाई 78.942 किलोमीटर है और इसमें कुल 3,822.31 करोड़ रुपए की लागत आएगी।
इस प्रस्तावित चार-लेन ग्रीनफील्ड परियोजना का उद्देश्य राज्य की राजधानी पटना और बेतिया के बीच संपर्क को बेहतर बनाना है। इससे उत्तर बिहार के वैशाली, सारण, सीवान, गोपालगंज, मुजफ्फरपुर, पूर्वी चंपारण और पश्चिमी चंपारण जिले, भारत-नेपाल सीमा से लगे क्षेत्रों तक जुड़ जाएंगे। यह परियोजना लंबी दूरी के माल परिवहन को बढ़ावा देगी, प्रमुख बुनियादी ढांचे तक पहुंच में सुधार लाएगी और कृषि व औद्योगिक क्षेत्रों और सीमा पार व्यापार मार्गों से संपर्क में सुधार करके क्षेत्रीय आर्थिक विकास को सुगम बनाएगी।
यह परियोजना सात पीएम गति शक्ति आर्थिक नोड्स, छह सामाजिक नोड्स, आठ लॉजिस्टिक नोड्स, नौ प्रमुख पर्यटन और धार्मिक केंद्रों को जोड़ेगी जिससे केसरिया बुद्ध स्तूप (साहेबगंज), सोमेश्वरनाथ मंदिर (अरेराज), जैन मंदिर और विश्व शांति स्तूप (वैशाली) और महावीर मंदिर (पटना) सहित प्रमुख विरासत और बौद्ध पर्यटन स्थलों तक पहुंच में सुधार होगा। इससे बिहार के बौद्ध सर्किट और अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन क्षमता को मजबूती मिलेगी।
एनएच-139डब्ल्यू की योजना वैकल्पिक मार्गों को उच्च गति कनेक्टिविटी प्रदान करने के लिए बनाई गई है। यह एनएच-31, एनएच-722, एनएच-727, एनएच-27 और एनएच-227ए के लिए एक महत्वपूर्ण संपर्क के रूप में काम करेगा।
यह 100 किमी/घंटा की डिजाइन गति के लिए बनाया गया है लेकिन वाहनों के लिए 80 किमी/घंटा की औसत गति से चलने की क्षमता रखता है। इससे साहेबगंज और बेतिया के बीच कुल यात्रा समय, मौजूदा विकल्पों की तुलना में 2.5 घंटे से घटकर 1 घंटा रह जाएगा। साथ ही यात्री और मालवाहक वाहनों के लिए सुरक्षित, तेज और निर्बाध कनेक्टिविटी भी मिलेगी।
78.94 किलोमीटर लंबी इस प्रस्तावित परियोजना से लगभग 14.22 लाख मानव दिवस प्रत्यक्ष रोजगार और 17.69 लाख मानव दिवस अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित होंगे। प्रस्तावित कॉरिडोर के आसपास के क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि होगी और इस परियोजना से अतिरिक्त रोजगार के अवसर भी सृजित होंगे।
एनएच-139डब्ल्यू के साहेबगंज-अरेराज-बेतिया खंड के लिए परियोजना संरेखण मानचित्र

कैबिनेट ने बिहार में बख्तियारपुर-राजगीर-तिलैया एकल रेलवे लाइन खंड (104 किलोमीटर) के दोहरीकरण को स्वीकृति दी, जिसकी कुल लागत 2,192 करोड़ रुपये है
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने बिहार में बख्तियारपुर-राजगीर-तिलैया एकल रेलवे लाइन खंड (104 किमी) के दोहरीकरण को मंजूरी प्रदान की, जिसकी कुल लागत लगभग 2,192 करोड़ रुपये है।
यह परियोजना बिहार राज्य के चार जिलों को कवर करेगी और भारतीय रेल के मौजूदा नेटवर्क में लगभग 104 किलोमीटर की वृद्धि रहेगी।
यह रेल मार्ग राजगीर (शांति स्तूप), नालंदा, पावापुरी जैसे प्रमुख धार्मिक और पर्यटन स्थलों को जोड़ता है, जो देश भर से तीर्थयात्रियों और पर्यटकों को आकर्षित करती हैं।
इस मल्टी-ट्रैकिंग परियोजनाओं से लगभग 1,434 गांवों और लगभग 13.46 लाख आबादी, जिसमें दो आकांक्षी जिलें (गया और नवादा) शामिल हैं, की कनेक्टिविटी बढ़ेगी।
ये मार्ग कोयला, सीमेंट, क्लिंकर, फ्लाई ऐश आदि वस्तुओं के परिवहन के लिए आवश्यक है। क्षमता वृद्धि कार्यों के परिणामस्वरूप 26 मिलियन टन प्रति वर्ष की अतिरिक्त माल ढुलाई होगी। रेलवे पर्यावरण-अनुकूल और ऊर्जा-कुशल परिवहन साधन होने के नाते देश के जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने और रसद लागत को कम करने में मदद करेगा, साथ ही तेल आयात (5 करोड़ लीटर) को घटाएगा और सीओ2 उत्सर्जन (24 करोड़ किलोग्राम) को कम करेगा, जो एक करोड़ पेड़ लगाने के बराबर है।
बढ़ी हुई लाइन क्षमता से गतिशीलता में सुधार होगा तथा भारतीय रेल की कार्यकुशलता और सेवा विश्वसनीयता बढ़ेगी। मल्टी-ट्रैकिंग का यह प्रस्ताव परिचालन को सुगम बनाएगा और भीड़ को कम करेगा, जिससे भारतीय रेलवे की सबसे व्यस्त खंडों पर आवश्यक बुनियादी ढांचागत विकास होगा। ये परियोजनाएं प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के ‘नए भारत’ के विज़न के अनुरूप हैं, जो इस क्षेत्र के लोगों को व्यापक विकास के माध्यम से “आत्मनिर्भर” बनाएंगी, जिससे उनके रोज़गार/स्वरोज़गार के अवसर बढ़ेंगे।
ये परियोजनाएं पीएम-गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान के तहत एकीकृत योजना और हितधारक परामर्श के माध्यम से मल्टी-मॉडल कनेक्टिविटी और लॉजिस्टिक दक्षता को बढ़ाने पर केन्द्रीत है। ये परियोजनाएं लोगों, वस्तुओं और सेवाओं की आवाजाही के लिए निर्बाध कनेक्टिविटी प्रदान करेंगी।
